उपन्यास

रक्षाबंधन आया पर देश है भरमाया

-नेशनल वार्ता ब्यूरो-

रक्षाबंधन का पावन त्योहार है कल। इसे भाई और बहन के पवित्र रिश्ते से जोड़ा जाता है लेकिन अब समय आ गया है कि इसी रक्षाबंधन के दिन देश की रक्षा की सौगन्ध भी खाई जाए। भाई बहन का रिश्ता तभी कामयाब होगा जब देश कामयाब होगा। देश को कामयाब होने के लिए हमें रक्षाबंधन के साथ ही एक और रक्षाबंधन मनाना चाहिए। जिसके तहत देश की रक्षा की सौंगन्ध खाते हुए देश पर मर मिटने का प्रण लेना चाहिए। सौगन्ध खाई जानी चाहिए कि हर वह काम करेंगे जो देश को मजबूत करे। ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे देश पर आँच आती हो। हर उस काम का विरोध करेंगे जो देश की गरिमा को ठेस पहुँचाता हो। हर वह काम करेंगे जो देश के विरूद्ध काम करने वालों को सबक सिखाता हो। देश के विरोध में खड़े लोगों को होश में लाता हो। अब तक तो हर भारतीय यह सच जान ही चुका है कि भारत वर्ष के अंदरूनी दुश्मन बाहरी दुश्मनों से संख्या में अधिक हैं और खतरनाक भी अधिक हैं। यह सब जानने समझने के बावजूद हमें कल एक और रक्षाबंधन मनाना चाहिए। राष्ट्र के नाम एक दूसरे को राखी बाँधनी चाहिए। हम जिस दौर में हैं यह दौर 1947 वाले दौर से ज्यादा खतरनाक है। उस समय ऐसे हिन्दुओं की संख्या कम थी जो राजनीति के लिए देश को नजरअंदाज कर दे। आज ऐसे हिन्दुओं की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। जिनको अपनी राजनीति के बाड़े से बाहर कुछ नहीं दिखाई दे रहा। इन राजनीतिक नेताओं में रेवड़ीबाज नेता भी शामिल हैं। हमें रक्षाबंधन की गरिमा और गुरूत्व दोनों को बढ़ाना है। हमें मौजूदा समय की चुनौतियों को अच्छी तरह समझना है। इन चुनौतियों को हम किसी राजनीतिक दल के भरोसे नहीं छोड़ सकते। हमें स्वयं आगे आना होगा और अपनी कथनी और करनी से बुलंद भारत की मजबूत आधारशिला रखनी होगी।

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