गढ़वाल की रानी कर्णावती की दून घाटी

कभी नवादा एक बड़ा कस्बा था
लेखः सावित्री पुत्र वीर झुग्गीवाला (वीरेन्द्र देव ) और एम0एस0 चौहान
श्रोत: देहरादून का इतिहास, लेखक: जीआरसी विलियम्स
पुस्तक के अनुवादक: प्रकाश थपलियाल
पुस्तक प्राप्ति का श्रोत: दून लाइब्रेरी, परेड मैदान देहरादून
कहा जाता है कि गुरू राम राय चमत्कार करते थे। उदासी फकीर बताते हैं कि वे स्वयं मर जाते थे और फिर अपनी इच्छा से उठ जाते थे। गुरू राम राय ने यह प्रयोग कई बार कर चुके थे। गुरू ने एक बार अपनी आज्ञाकारिणी पत्नी से कहा कि तीन दिन तक वे उनके निकट ना आएं। गुरू राम राय एक कोठरी में बंद हो गए। जब तीन दिन बाद दरबाजा खोजा गया तो उन्हें मृत्यु पाया गया। वे जो प्रयोग कर रहे थे उसमें वे शायद सफल नहीं हुए। जिस बिस्तर पर वे मृत पड़े थे वह आज भी स्मारक के रूप में विराजमान है। श्रद्धालु आज भी इस पावन स्थल की पूजा करते हैं। गुरू राम राय बहुत ऊँचे दर्जे के साधक थे। वे शादी शुदा थे। वे किसी तरह का आडम्बर पसन्द नहीं करते थे। गुरू राम राय गुरू गोविन्द सिंह जी के परिवार से ही थे। यहाँ एक मन्दिर था। जहाँ पर आज दरबार साहिब हैं। मन्दिर से लगे जलाशयों के लिए जिस राजपुर नहर से पानी आता था, उसके निर्माण का श्रेय कभी तो माता पंजाब कौर को और कभी राजपूत रानी कर्णावती को दिया जाता है। कहा जाता है कि रानी कर्णावती ने देहरा और राजपुर के क्षेत्रों को उपजाऊ बनाने और खेती को बढ़ावा देने के लिए इस नहर का निर्माण करवाया था। बाद में इसका प्रबन्धन महंत के हाथ में चला गया। रानी कर्णावती का एक महल देहरा से पाँच मील दक्षिण पूर्व में सुसवा नदी के बाएं किनारे साल के पेड़ों से ढकी पहाड़ी भूमि नवादा में था। बनावट की वजह से नवादा को नाग सिद्ध भी कहा गया। यहाँ रानी का महल एक शानदार इमारत के रूप में रहा होगा। नवादा कभी बड़ा कस्बा और दून की राजधानी था। घाटी खुशहाल थी। यहाँ मैदानों से आकर मुख्यतः राजपूत और गूजर रहते थे। अजबपुर का नाम अजबू कुँवर के नाम पर पड़ा। कर्णपुर का नाम रानी कर्णावती के नाम पर पड़ा। गढ़वाल का राजा कभी-कभी नवादा आकर शान से रहता था। पृथ्वीपुर में आज भी ऐसे अवशेष मौजूद हैं जो इस इलाके की समृद्धि का अहसास कराते हैं। इनमें एक पुराना किला, मंदिर और सती स्मारक शामिल हैं। कहा जाता है कि ये गढ़वाल के राजा से सम्बन्धित किसी जाने माने परिवार से जुड़े  हैं। इस परिवार के एक मुखिया चंडा या झंडा मियाँ थे। जिसकी जीवनी पर आज कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है। गुरू राम राय के दून आगमन के कुछ ही समय बाद फतेह साह की मौत हो गयी और उसके स्थान पर उसका पोता प्रदीप, प्रतीप या परतीप साह गद्दी पर बैठा जो एक शिशु था। वह जब बड़ा हुआ तो गढ़वाल में शांति, समृद्धि और खुशहाली थी तब यानी 1786 में ऐसे गाँवों की संख्या 400 के आसपास थी जहाँ कृषि फलफूल रही थी। दून की खुशहाली ने सहारनपुर के सूबेदार नजीब-उद्दौला का ध्यान खींचा। वह मुगल सल्तनत का एक सरदार था। उसने शिवालिक पार किया और 1757 में दून पर अधिकार कर लिया। प्रदीप साह ने उसका विरोध तो किया पर वह सफल नहीं रहा। नजीब-उद्दौला के सैनिक पानीपत से विजय होकर लौटे थे और उनमें उत्साह भरा हुआ था। 19वीं सदी के शुरू में गोरखों ने दून पर अधिकार किया और उनको हराकर यहाँ अंग्रेजों का शासन शुरू हुआ। अंग्रेजों के रिकार्ड बताते हैं कि दून के लोग बहुत अंधविश्वासी थे। वे भूत, चुडैल, खपीस, मसाण और तमाम तरह के भूतों पिचासों में विश्वास करते थे। शायद, यहाँ वर्णित रानी कर्णावती गढ़वाल की रानी कर्णावती ही हैं।

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