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नई शिक्षा नीति

-नेशनल वार्ता ब्यूरो-

नई शिक्षा नीति देर-सवेर लागू हो ही जाएगी। सवाल यह है कि इस शिक्षा नीति में भारत के संदर्भ में क्या प्रासंगिकता है। प्रासंगिकता का मतलब है भारत की धरोहर से जुड़ना। भारत की धरोहर से जुड़ने से मतलब है भारत के भिन्न-भिन्न प्रांतों की सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ना। भारत की सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ने के लिए हमें दस हजार साल के इतिहास से जुड़ना पड़ेगा। हमें उस इतिहास से जुड़ना पड़ेगा जो चौदह सौ साल पहले या दो हजार साल पहले कभी अस्तित्व में थी। कुल-मिलाकर यदि हम केवल दो हजार साल के इतिहास को ही इतिहास मानते हैं तो हम भारत की सांस्कृतिक धरोहर से कभी नहीं जुड़ पाएंगे। हम यह नहीं कह रहे कि गुजरे दो हजार साल का इतिहास भुला दिया जाए। हम तो यह कह रहे हैं कि हमारे बच्चों को दस हजार साल का इतिहास पढ़ाया और समझाया जाए। इसके बाद किताबी बोझा कम किया जाए। हल्के-हल्के में विज्ञान समझाया जाए। बेहद आसान अंदाज में गणित पढ़ाया जाए। किताबें कम से कम हों। विषय कम से कम हों। खेल-कूद और योग की भरमार हो। कामचोर और आलसी शिक्षकों से पिंड छुड़ाया जाए। मेहनती और ईमानदार शिक्षक भर्ती हों। शिक्षा ऐसी हो कि आठवीं पास भी नौकरी लग सकें। दसवीं पास भी नौकरी लग सकें। बारहवीं पास भी खाली न रहें। अगर नई शिक्षा नीति में ऐसा कुछ है तो बहुत अच्छी बात है। सच्चा इतिहास और वैज्ञानिक शिक्षा ही भविष्य में उन्नति का आधार होने वाला है। अगर मोदी जी की शिक्षा नीति ऐसी ही है या इससे मिलती-जुलती है तो बहुत अच्छी बात होगी। अगर ऐसा नहीं है तो नई शिक्षा नीति भारत का कायाकल्प नहीं कर पाएगी।-वीरेन्द्र देव गौड़, पत्रकार, देहरादून

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