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ऋषि सुनक पार लगाएंगे ब्रिटेन की नैया

-वीरेन्द्र देव गौड़ एवं एम एस चौहान

जब ब्रिटेन के अंग्रेज हार गए तो एक भारतीय मूल का नेता ब्रिटेन की नौका का जिम्मा ले बैठा। इस खेवनहार से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह ब्रिटेन की खस्ताहाल माली हालत को दुरूस्त कर देगा। कुछ दिन पहले वहाँ की महिला प्रधानमंत्री ने पद छोड़ दिया। वे हाँफ बैठीं। उन्होंने हाथ खड़े कर दिए कि ब्रिटेन की हालत सुधारना उनके बूते से बाहर की बात है। उनकी तारीफ की जानी चाहिए। हमारे देश में तो ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी बड़े पदाधिकारी ने अपनी अक्षमता को स्वीकार किया हो। हमारे देश के नेता तो कुर्सी से चिपके रहते हैं भले ही देश की लुटिया डूब जाए। पद छोड़ने वाली महिला प्रधानमंत्री की नैतिकता सराहनीय है। हालाँकि इस नैतिकता में उनकी अक्षमता भी शामिल है। उनसे पहले पुरूष प्रधानमंत्री भाग खड़े हुए है। उनसे भी ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति संभाली नहीं जा सकी। दो रण छोड़ प्रधानमंत्री अब ऋषि सुनक से अपेक्षा कर रहे हैं कि वे ब्रिटेन की डूबती नैया को पार लगा दें। बोरिस जॉनसन इस बार भी आगे तो आए चुनाव लड़ने के लिए किन्तु फिर उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए। ऋषि सुनक अंग्रेज नहीं हैं। इसलिए उनकी चुनौती पहले दो भगोड़े प्रधानमंत्रियों से दो गुना अधिक है। सुनने में आया है कि ऋषि सुनक की कंजरवेटिव पार्टी में एकता का अभाव चल रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि ऋषि सुनक वामपंथी रूझान वाले हैं। जो भी हो, अब उन्हें सभी रूझानों को छोड़ कर एक रूझान को गले लगाना होगा। वह रूझान है ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को बिखरने से बचाना । भारत के साथ ब्रिटेन का तारतम्य बैठाना। भारत एक उभरती अर्थव्यवस्था है। ब्रिटेन भी एक लोकतंत्र है। उभरती अर्थव्यवस्था के नाते ब्रिटेन भारत से लाभ उठा सकता है। भारत को भी ब्रिटेन का लाभ उठाना चाहिए। यदि ऋषि सुनक का हृदय भारतीय है और वे भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं का सम्मान करते हैं तो दोनों देशा के बीच आर्थिक संबंघ मजबूत हो सकते हैं। रूस और यूक्रेन के युद्ध के कारण ब्रिटेन को भी नुकसान तो हो ही रहा है। क्योंकि ब्रिटेन यूरोप का हिस्सा है। रूस की क्षमता को नजर अंदाज करना यूरोप को महंगा पड़ रहा है। रूस अगर खुद डूबा तो वह यूरोप को भी लेकर डूबेगा। रूस अकेला नहीं डूबेगा। रूस आखिर रूस है। अभी भी समय है कि ब्रिटेन रूस को लेकर अपना दृष्टिकोण बदले। यूक्रेन को बफर जोन घोषित कर देना चाहिए। इस मुद्दे पर शायद युद्ध रूक जाए। कुल मिला कर ब्रिटेन और भारत के आर्थिक संबन्धों में यह पहलू भी आड़े आता रहेगा। इसके बावजूद ऋषि सुनक से इतनी अपेक्षा तो की जा सकती है कि वे भारत के दृष्टिकोण को बेहतर ढंग से समझें।

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