ऋषिकेश के गंगा घाट बिकते हैं पर क्यों

गंगा आरती को बेचोगे तो क्या हिन्दू कहलाओगे
-वीरेन्द्र देव गौड़, पत्रकार, देहरादून
ऋषिकेश के कुछ धार्मिक निकेतन गंगा आरती को बेच रहे हैं। धनवानों से बड़ी-बड़ी धनराशि को लेकर उन्हें विशेष तरीके से गंगा आरती करवाना क्या आरती को बेचना नहीं है। क्या सनातन धर्म में आरती को बेचा जाएगा। आरती एक ऐसा धार्मिक उपाय है जिसके माध्यम से हम सीधे-सीधे अपने आराध्य से जुड़ते हैं। इसके अलावा माँ गंगा की स्तुति भी करते हैं। इस स्तुति गान को धन लेकर बेचना सनातन परम्परा के विरूद्ध है। सनातन परम्परा आरतियों को बेचकर धन कमाने के लिए नहीं है। बड़ी-बड़ी धनराशि देने वाले आरती के लिए बुकिंग करवा लेते हैं और तयशुदा समय पर आरती में भाग लेकर स्वयं को साधु सिद्ध कर देते हैं। क्या सचमुच ऐसे श्रद्धालु पवित्र मन वाले माने जा सकते हैं। कदापि नहीं। ये तो धन की धौंस दिखाना हुआ। वे लोग जो बड़ी-बड़ी धनराशियाँ समर्पित करके गंगा आरती करने की क्षमता नहीं रखते वे ऐसे धनवान कथित श्रद्धालुओं को दूर कहीं से देखते हैं और गंगा आरती देखकर खुश हो जाते हैं। इन बेचारे असली श्रद्धालुओं के दिल पर क्या गुजरती होगी। क्या ऐसी प्रायोजित गंगा आरतियाँ करवाने वाले महात्माओं ने यह सोचा है। अगर सोचेंगे तो उन्हें इस बात का अहसास होगा कि यह कुकर्म है। पर्ची काटने की यह परम्परा स्वस्थ नहीं है। जो जितने अधिक धन की पर्ची कटवा देगा उसकी बारी पहले आ जाएगी। यह मोलभाव कहा जाता है। गंगा आरती के लिए यह मोलभाव वाली बात सनातन धर्म के अनुकूल नहीं। हम वैदिक परम्पराओं से दूर हटते जा रहे हैं। हम सर्वे भवन्तु सुखिनः की राह से भटक गए हैं। धन लेकर यदि ऋषिकेश में या कहीं और भी गंगा आरतियों का आयोजन किया जा रहा है तो यह नैतिकता के खिलाफ है। जो नैतिकता के खिलाफ है वह अधर्म है। अगर धनबल के आधार पर ऋषिकेश के धार्मिक निकेतन गंगा आरतियाँ करवा रहे हैं तो ऐसी आरतियाँ बन्द होनी चाहिए। गंगा आरतियाँ निःशुल्क होनी चाहिएं। वह अलग बात है कि किसी धर्म निकेतन में कौन श्रद्धालु कितना धन दे रहा है। लेकिन घाटों का इस अंदाज में बिकना नाजायज है। जिला प्रशासन को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। सनातन धर्म के नाम पर बट्टा लगाने का अधिकार किसी को नहीं है। गंगा आरतियाँ बेच कर परमार्थ के दूसरे काम करना मात्र एक बहाना है। अगर नहीे तो गंगा आरतियों को धन से मुक्त कर दो।

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