ताज महल का वास्तविक नाम तेजो महल है

-नेशनल वार्ता ब्यूरो-

जहाँ कहीं भी आप मुग़लों की खास-खास इमारतें देखते हैं वहाँ पहले हिन्दू इमारतें हुआ करती थीं। मुगल सुन्नी मुसलमान थे। बाबर के जमाने से मुगलों का उसूल रहा है कि हिन्दुओं की इमारतों पर अपनी इमारते खड़ी करो ताकि हिन्दुओं का मानमर्दन हो और वे हताश होकर मुसलमान बन जाएं। बल्कि यह रिवाज बाबर से भी पहले से चला आ रहा है। सच कहें तो यह रिवाज चौदह सौ सालों से चला आ रहा है। अगर उत्तर प्रदेश की सरकार ताज महल का नाम बदलना चाहती है तो इससे अच्छी बात कुछ नहीं हो सकती। नाम वास्तविक होने चाहिए। तलवार की नोक पर लिखे गए नाम बदल दिए जाने चाहिएं। कहा जाता है कि किसी राजपूत राजा ने ताज महल की जगह पर तेजो महल का निर्माण करवाया था। यह महल बहुत सुन्दर था और सुन्दर बगीचों से घिरा हुआ था। कहते हैं कि यमुना के किनारे शोभायमान इस महल की खूबसूरती देखते ही बनती थी। शाहजहाँ अपने बाप दादाओं की तरह हिन्दू राजाओं से हिन्दू राजाओं को लड़वाता था। खास कर राजपूत राजाओं को दास बना कर वह अन्य हिन्दू राजाओं को तबाह कर देता था। यही नीति औरंगजेब ने भी अपनायी। आपको ताज्जुब होगा कि यही नीति अंग्रजों ने भी अपनायी। अंग्रेज बहुत चालाक थे। लेकिन मुगल अंग्रेजों से भी अधिक चालाक थे। उनकी पूजा करने वाले जो आज भारत में हैं ये भी बहुत चालाक हैं। इस चालाकी को शातिराना चालाकी कहते हैं। लेकिन भोलेभाले हिन्दू कुछ भी समझने को तैयार नहीं हैं। गुलामी के अंश हिन्दुओं से जाते ही नहीं। बहरहाल, ताजमहल का नाम तो बदला ही जाना चाहिए। तेजो महल में परिवर्तन करके ताज महल बनाया गया। इन परिवर्तनों के लिए शाहजहाँ ने भारत समेत ईरान और इराक से यहाँ तक कि मध्य एशिया से कारीगर बुलवाये थे। ताकि तेजो महल का कोई निशान शेष ना रहने पाए। लेकिन सच तो कभी न कभी बाहर आता ही है। अगर उत्तर प्रदेश की सरकार स्वतंत्र भारत की एक राज्य सरकार की तरह सोचती है तो ऐसा करने में कोई बुराई नहीं। यह हमारा संवैधानिक अधिकार है कि हम गुलामी के अंशों को नष्ट कर दें।

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