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झोपड़ी वाला राजा नेहरू कॉलोनी देहरादून का सुभाष

सुभाष जी ने पुत्रों से कहा था पढ़ाई से ही बढ़ेगा मान-सम्मान
एक ध्याड़ी मजदूर की दरियादिली
-वीरेन्द्र देव गौड, एम.एस. चौहान-
झोपड़ी में रहे। ध्याड़ी मजदूरी करते रहे। पहले छज्जे के नीचे रहे फिर बरसों तक झोपड़ी में गुजर-बसर की और अब नेहरू कॉलोनी में किराए के मकान में रह रहे हैं दो एम.बी.बी.एस डॉक्टरों के पिता। एक लड़का डॉक्टर बन चुका है और करीब आठ महीनों से सरकारी अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहा है और दूसरा पुत्र डॉक्टर बनने ही वाला है। सुभाष, जिनके जीवन की व्यथा-कथा और सफलता हम यहाँ लिख रहे हैं वे भयानक संघर्ष की कड़वाहट से नहीं भरे। बल्कि, उनके अन्दर मानवीयता की ऐसी मिठास है जो संतों में भी नहीं पाई जाती। उन्होंने अपने संघर्ष में ऐसा कौन सा कठिन मोड़ नहीं देखा जो आदमी के इरादों को बिखेर कर नहीं रख देता है। चालीस साल पहले पुराने जमाने की प्रेस में उन्होंने कम्पोजिंग से रोटी कमाना शुरू किया था। इसी काम में उन्होंने फिर ठेकेदारी भी की। इसके बाद ट्रकों पर ईटें चढ़ाईं-उतारीं। ठेली खरीदकर कच्छे-बनियान बेचे। ठेली पर सब्जियाँ और मूँगफलियाँ बेचीं। इस तरह पिता के सरकारी नौकरी पर रहते हुए भी उन्होंने दर-दर की ठोकरें खाकर अपनी रोटी खुद कमाई। छोटी उम्र में शादी हुई। फिर दो बच्चे हुए। विकट संघर्ष लगातार चलता रहा। हिम्मत नहीं हारी। कुछ भले लोगों के सहयोग से एक लड़के को सरकारी डॉक्टर बना चुके हैं और दूसरा बनने वाला है। अब सुभाष जी नेहरू कॉलोनी में किराए के मकान में रह रहे हैं। कई साल पहले कुछ दोस्तों के सहयोग से किसी तरह एक लोडर खरीदी थी। फिर 2007 में टैम्पो खरीदा और अब तो सुभाष जी बोलेरो के मालिक हैं। आज भी वही कर्मठता। अब राजा दिल के सुभाष गरीबों को धन देकर उनकी पढ़ाई-लिखाई में मदद करने लगे हैं। उनका ऐलान है कि वे अपने जीवन के अंतिम पल तक गरीब बच्चों को आर्थिक सहायता देंगे और बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने में मदद करेंगे। ऐसे गरीब रहे राजा दिल लोगों को सरकार को नागरिक पुरस्कार देने चाहिएं ताकि ऐसे कर्मठता के संत हमारे-तुम्हारे जैसे आम आदमियों के लिए प्रेरणा के स्रोत बन सकें। इनका लड़का विश्वजीत डॉक्टर बन चुका है और दूसरा लड़का कार्तिक एम.बी.बी.एस होने वाला है। सुभाष जी के बच्चों की पढ़ाई के दौरान मदद करने वाले पुष्कर सिंह पोखरियाल और श्याम सुंदर जी के प्रति सुभाष बहुत श्रद्धा रखते हैं क्योंकि इन लोगों ने पिछले कुछ वर्षों में उनकी तरह-तरह से मदद की है। बलूनी क्लासेस के एक अध्यापक ने इनके एक पुत्र को बिना फीस लिये पढ़ाया था जिसके लिए सुभाष जी उनका आभार व्यक्त करते रहते हैं। 8वीं पास सुभाष छोटी उम्र में देवरिया, उत्तर प्रदेश से देहरादून आए थे।

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