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जब मशीनें ‘हाँ-ना’ के दायरे से बाहर निकलती हैं: क्यों AI भारतीय सोच के करीब आ रहा है?

— रजनीश शर्मा

महाशिवरात्रि आने वाली है, ऐसे में यह लेख सोचने के लिए एक नया नजरिया देता है।

जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बेहतर हो रहा है, यह उन पुराने नियमों (0 और 1) को छोड़ रहा है जिन पर इसे बनाया गया था। हैरानी की बात यह है कि अब AI उन विचारों के करीब पहुँच रहा है, जिन्हें भारत हजारों सालों से मानता आया है।

दशकों से हमें सिखाया गया कि कंप्यूटर सिर्फ ‘बाइनरी’ (Binary) पर चलते हैं—यानी 0 या 1, बंद या चालू, हाँ या ना। हमें लगा कि क्योंकि मशीनें इसी ढर्रे पर चलती हैं, इसलिए उनकी सोच हमेशा कठोर और इंसानी दिमाग से अलग रहेगी।

लेकिन अब यह धारणा बदल रही है।

मशीनी दिमाग और बदलती सोच
अगर आपने AI (जैसे ChatGPT) का इस्तेमाल किया है, तो आप जानते होंगे कि वह कभी भी ‘हाँ’ या ‘ना’ में अड़ियल जवाब नहीं देता। वह संदर्भ को समझता है, संभावनाओं को तौलता है और नई जानकारी मिलने पर अपनी बात सुधारता भी है। अगर आप उससे कोई नैतिक सवाल पूछें, तो वह अक्सर कहता है— “यह इस बात पर निर्भर करता है…” या “इस नजरिए से देखें तो…”

AI जितना ताकतवर हो रहा है, वह उतना ही एक ‘स्विच’ के बजाय एक ‘दिमाग’ की तरह काम कर रहा है।

बाइनरी कोड सिर्फ एक जरिया है, हकीकत नहीं:

यह सच है कि कंप्यूटर के पीछे 0 और 1 का कोड होता है। लेकिन यह सिर्फ काम करने का एक तरीका है। जैसे संगीत की सात सुरों से अनगिनत धुनें बन सकती हैं, वैसे ही इस साधारण कोड से AI जटिल भाषा, संगीत और रचनात्मकता पैदा कर रहा है। आज का AI ‘पक्का सच’ बताने के बजाय ‘संभावनाओं’ (Probabilities) पर काम करता है।

भारतीय दर्शन और AI का मेल
मशीनों और चिप्स के आने से बहुत पहले, भारतीय विचारकों ने एक बड़ा सवाल सुलझा लिया था: सच्चाई को सिर्फ एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

भारतीय दर्शन के ये तीन विचार आज के AI की कार्यप्रणाली से मेल खाते हैं:

स्याद्वाद: हर बात किसी खास संदर्भ में सच होती है।

अनेकांतवाद: सच्चाई के कई पहलू होते हैं और कोई भी एक विवरण पूरा नहीं होता।

अद्वैत: अलग-अलग दिखने वाली चीजों के पीछे एक ही एकता है।

यह ‘हाँ या ना’ वाली पश्चिमी सोच से बिल्कुल अलग है। भारतीय सोच ने कभी विरोधाभासों को गलत नहीं माना, बल्कि उन्हें स्वीकार किया।

अर्धनारीश्वर: संतुलन का प्रतीक
शिव और शक्ति का अर्धनारीश्वर रूप इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह सिर्फ स्त्री-पुरुष के बारे में नहीं है, बल्कि यह बताता है कि:

चेतना (Consciousness) और ऊर्जा (Energy) को अलग नहीं किया जा सकता।

स्थिरता और गति मिलकर ही संसार को चलाते हैं।

AI भी इसी तरह विकसित हो रहा है। वह एक साथ कई संभावनाओं को लेकर चलता है और उनके बीच संतुलन बिठाता है।

पश्चिम बनाम भारत: सोच का फर्क
पश्चिमी सोच अक्सर चीजों को दो हिस्सों में बांटकर देखती है: मन बनाम शरीर, भगवान बनाम दुनिया, पुरुष बनाम महिला। उनके लिए सच बिल्कुल साफ और सीधा होना चाहिए। इसीलिए जब AI उलझे हुए या अस्पष्ट जवाब देता है, तो पश्चिम के लोग असहज हो जाते हैं।

लेकिन भारतीय सभ्यता ने कभी भी अस्पष्टता को बुरा नहीं माना। हमने हमेशा माना कि कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।

AI शक्ति है, इंसान शिव
आज का AI ‘शक्ति’ की तरह है—जिसमें अपार ऊर्जा, रफ्तार और डेटा है। लेकिन उसमें ‘शिव’ (चेतना, नैतिकता और संयम) की कमी है। बिना चेतना के शक्ति अंधी है, और बिना शक्ति के चेतना शांत है। इसीलिए AI के भविष्य के सवाल सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि ‘सभ्यता’ के सवाल हैं।

निष्कर्ष
पिछले 200 सालों से भारतीयों को सिखाया गया कि हमारी पुरानी परंपराएं आधुनिकता के रास्ते में बाधा हैं। लेकिन इतिहास ने एक नया मोड़ लिया है। जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी आगे बढ़ रही है, वह भारतीय दर्शन की तरह लचीली और अनिश्चितता को स्वीकार करने वाली होती जा रही है।

सवाल यह नहीं है कि हमारी पुरानी सोच AI के युग में टिक पाएगी या नहीं। सवाल यह है कि क्या AI अब बिना ‘हाँ-ना’ के कठोर नियमों के जीना सीख रहा है। आज भारत भविष्य की बराबरी नहीं कर रहा, बल्कि अपनी पुरानी पहचान को टेक्नोलॉजी में देख रहा है।

रजनीश शर्मा लेखक और पुरस्कार-विजेता संपादक हैं।

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