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भारत की फ्लावर पावर: पंखुड़ियों, सुगंधों और सॉफ्ट पावर की एक इंद्रिय सिम्फ़नी

लेखक: रजनीश शर्मा
पुरस्कार विजेता संपादक एवं विचारक

आज सुबह, जब सर्दी की जकड़न आखिरकार ढीली पड़ती है, भारत एक ऐसे आकाश के नीचे जागता है जो धुलकर हल्का नीला हो गया है। आज, 23 जनवरी को बसंत पंचमी मनाई जा रही है—वसंत का उजला उद्घोष। उत्तर भारत में भक्त केसरिया पीले रंग में खिल उठे हैं। दूर-दूर तक फैले सरसों के खेत—सरसों का खेत—विद्युत सुनहले समुद्र की तरह लहराते हैं, मानो लाखों नन्हे सूरज हवा में थरथरा रहे हों।

गहरी साँस लीजिए। हवा में कच्चे पराग की हल्की तीखापन है, भीगी मिट्टी की सोंधी महक घुली है—नाक में झनझनाती मिर्ची-सी चुभन, जो उर्वरता, नवजीवन और आने वाली फसल के मीठे वादे का संदेश देती है। बसंती कपड़ों में सजे स्कूली बच्चे सरस्वती को प्रणाम कर रहे हैं। उनकी प्रतिमा गेंदे की मालाओं से लदी है—अग्नि-सी नारंगी पोंप-पोंप पंखुड़ियाँ, जिनसे नींबू-सी, मिट्टी-सी महक निकलती है जो त्वचा और स्मृति—दोनों से चिपक जाती है।

यह कोई साधारण त्योहार नहीं है। यह भारत की साल-भर चलने वाली पुष्प-कोरियोग्राफ़ी का उद्घाटन स्वर है—एक ऐसा वनस्पति-सभ्यता-नृत्य, जहाँ समय कैलेंडर से नहीं, बल्कि फूलों से मापा जाता है। यहाँ पंखुड़ियाँ आशीर्वाद हैं, सुगंधें अनुष्ठान हैं और रंग आत्मा को रंग देते हैं।

पंखुड़ियों में लिखा कैलेंडर: भारत का पुष्प-नाट्य
दुनिया फूलों के नाम पर जापान की सकुरा या नीदरलैंड के ट्यूलिप को याद करती है। और भारत—धरती की सबसे जीवित पुष्प-संस्कृतियों में से एक—पृष्ठभूमि में रह जाता है। यह एक सभ्यतागत भूल है। और एक ऐतिहासिक अवसर भी—अपनी “फ्लावर पावर” को पूरी ठसक के साथ वैश्विक सॉफ्ट पावर में बदलने का।

बसंत पंचमी से यह यात्रा उत्तराखंड के मार्च के फूलदेई तक जाती है। छोटी बच्चियाँ टोकरी में फ्योंली और लाल बुरांश भरकर घरों की देहरी पर बिखेरती हैं—
“फूलदेई, छम्मा देई”—समृद्धि का आशीर्वाद।

केरल में अप्रैल का विषु सुनहरे कोन्ना से फूट पड़ता है। फिर ओणम के पूक्कलम—हिबिस्कस, चमेली, गेंदा, कमल—आँगनों में साँस लेते रंगीन मंडल बन जाते हैं। हवा में नारियल तेल, कुचली पंखुड़ियाँ और धूप घुल जाती है।

तेलंगाना का बथुकम्मा—नौ दिनों का पुष्प-ज्वालामुखी—तंगेडु, गुनुगु, चामंती, पलाश और गेंदा से बने शंकुओं में फूट पड़ता है। शाम होते-होते ये झीलों पर आकाशगंगाओं की तरह तैरते हैं।

असम में बिहू के समय सफ़ेद कोपौ बालों में सजता है। मदुरै की गलियों में मल्लि की सुगंध तरल चाँदनी की तरह बहती है। बंगाल-ओडिशा में पलाश जंगलों को अग्नि बना देता है। बारह वर्षों में एक बार नीलगिरि की घाटियाँ नीलकुरिंजी से नीली हो जाती हैं—जैसे धरती ने आसमान पहन लिया हो।

हिमाचल की फुलैच में जंगली खुबानी खिलती है। यूपी की फूलों वाली होली में हरसिंगार की पंखुड़ियाँ बरसती हैं। हर जगह कमल—तालाबों, मंदिरों और कविताओं में—पवित्र गुलाबी मौन में तैरता है।

यह सजावट नहीं, एक सभ्यता है
भारत में फूल सजावटी नहीं हैं। वे प्रार्थना हैं। औषधि हैं। वचन हैं। स्मृतियाँ हैं।
द्वार पर आशीर्वाद। बालों में वेणी। मंदिरों में माला। विवाह और मृत्यु दोनों में पुष्प।

सुगंधों की स्मृति:
शाम की चमेली। मंदिर का गेंदा। विवाह का गुलाबजल। कुचला हुआ पलाश।

रंगों की स्मृति:
सरसों पीला। कमल गुलाबी। बुरांश लाल। कोन्ना सुनहरा।

शब्दों की स्मृति:
फूल, कुसुम, पुष्प, कमल, मल्लि, बुरांश, गेंदा, रजनीगंधा, चंपा, केतकी, मधुमालती—हर नाम आधी कविता है।

मिट्टी से आत्मा तक: सुगंधित सॉफ्ट पावर
जापान ने सकुरा से जो किया, भारत सौ फूलों से कर सकता है—और ज़्यादा प्रामाणिक ढंग से।
यह संस्कृति प्रदर्शनी नहीं है। यह जीया हुआ अनुभव है।

आज की थकी हुई दुनिया—जो आत्मा-विहीन पर्यटन से ऊब चुकी है—भारत की ऋतु-लय, लोक-परंपरा और पर्यावरणीय अनुष्ठानों की भूखी है।

वैश्विक पुष्प-राजधानी की कोरियोग्राफ़ी
भारत के पास सब कुछ है—बस निर्देशन चाहिए।

राष्ट्रीय पुष्प कैलेंडर
फ़रवरी: बसंत पंचमी—सरसों
मार्च: फूलदेई
अप्रैल: विषु—कोन्ना
अगस्त: चमेली
अक्टूबर: बथुकम्मा
नवंबर: कमल
दिसंबर: हिमालयी पुष्प

ब्रांड पुष्प
बुरांश—हिमालयी रूबी
मदुरै मल्लि—दुनिया की सबसे अंतरंग चमेली
कोन्ना—स्वर्ण वसंत
पलाश—भारत की अग्नि
कमल—पवित्र पुष्प

सुगंधित पर्यटन
मदुरै में चमेली-वेणी कार्यशालाएँ
वाराणसी में माला-निर्माण
कोच्चि में पूक्कलम प्रशिक्षण
मथुरा में फूलों से होली
गढ़वाल में फूलदेई ट्रेल
कश्मीर में कमल नौका-यात्रा

आज से शुरुआत
दुनिया को प्रामाणिकता चाहिए। स्थिरता चाहिए। आत्मा चाहिए।
और भारत के पास ये तीनों हैं।

और यह सब आज से शुरू होता है—बसंत पंचमी से।

फूलदेई की देहरी से लेकर बथुकम्मा की झीलों तक,
मदुरै की चमेली रातों से लेकर मंदिर तालाबों के कमल भोर तक—
भारत पहले से ही वैश्विक पुष्प-राजधानी है।
उसने बस अभी तक इसकी घोषणा नहीं की है।

प्रश्न यह नहीं कि हम फ्लावर पावर चला सकते हैं या नहीं।
प्रश्न यह है—क्या हम अब करेंगे?

क्योंकि जब भारत खिलता है, वह फुसफुसाता नहीं।
वह पीले-लाल विस्फोटों में फूट पड़ता है।
चमेली-भरी हवा में।
आशीर्वाद-सी गिरती पंखुड़ियों में।

फूलों को बोलने दीजिए।
सुगंधों को मोहित करने दीजिए।
रंगों को आदेश देने दीजिए।
इंद्रियों को जागने दीजिए।

भारत को खिलने दीजिए—भव्य रूप से।
और दुनिया केवल हमें देखे नहीं—
हमें महसूस करे, सूँघे और सदा के लिए प्रेम कर बैठे।

 

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