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जब भारत का ज्ञान ही उसके लिए मुसीबत बन गया – भाग 2

लेखक: रजनीश शर्मा

कैसे भारत के कपड़ों ने ही उसकी गुलामी की कहानी बुनी: पहले भाग में हमने देखा कि कैसे भारत के बौद्धिक उपहारों—शून्य, बीजगणित और खगोल विज्ञान—ने यूरोप को जगाया और बाद में उन्हीं का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया गया। अब इस ‘बूमरैंग’ (पलटवार) का दूसरा अध्याय सामने आता है: भारत की सबसे बेशकीमती रचना—उसका बेजोड़ कपड़ा।

जिस कपड़े की वजह से चार हजार सालों तक दुनिया भारत से ईर्ष्या करती थी, वही कपड़ा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को यहाँ खींच लाया। जो शुरुआत प्रशंसा से हुई थी, उसका अंत विनाश में हुआ। जिन करघों (looms) ने कभी मिस्र के फिरौन और रोमन सम्राटों के लिए कपड़े बुने थे, वही भारत की अर्थव्यवस्था के लिए फांसी का फंदा बन गए।

वैदिक काल से हड़प्पा के धागों तक

यह कहानी बहुत पुरानी है। ऋग्वेद की शुरुआत में दिन और रात की कल्पना दो ऐसे बुनकरों के रूप में की गई है जो ब्रह्मांड के करघे पर धागे डाल रहे हैं। उपनिषदों के अनुसार, यह ब्रह्मांड स्वयं एक निरंतर कपड़ा है।

पुरातत्व विभाग भी इस बात की पुष्टि करता है। हड़प्पा (3300 ईसा पूर्व) में हमें बुने हुए कपास के सबसे पुराने प्रमाण मिलते हैं। मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध ‘पुरोहित-राजा’ (Priest-King) की मूर्ति ने भी एक सुंदर कढ़ाई वाला कपड़ा पहना हुआ है। जब यूरोप पत्थर युग में था, भारत कपास उगाने, कातने और बुनने में दुनिया से 3,000 साल आगे था।

पूरी दुनिया भारत के कपड़ों की दीवानी थी

भारतीय कपड़ा केवल भारत तक सीमित नहीं रहा:

मिस्र: वहां के राजाओं (फिरौन) को गुजरात के ब्लॉक-प्रिंटेड सूती कपड़ों में दफनाया जाता था।

रोम: वहां की महिलाएं ‘बुनी हुई हवा’ (Woven Winds) यानी भारतीय मलमल के लिए भारी कीमत चुकाती थीं। मलमल इतना महीन था कि पूरी थान एक अंगूठी के बीच से निकल जाती थी।

भाषा: कपास के लिए लैटिन शब्द ‘Carbasina’ सीधे संस्कृत के शब्द ‘कर्पास’ से आया है।

बाइबिल: चौथी शताब्दी के लैटिन अनुवाद में भी भारत के पक्के रंगों की प्रशंसा की गई है।

चोल, चेर और पांड्य राजाओं के समय का रेशम और सूत पूरे हिंद महासागर और भूमध्य सागर के पार व्यापार किया जाता था। भारत केवल सामान भेजने वाला देश नहीं था, बल्कि वह दुनिया का ‘फैशन कैपिटल’ था।

कपड़े के लिए आई कंपनी

1600 के दशक की शुरुआत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक ही मकसद था: भारतीय कपड़ा हासिल करना। ये कपड़े इतने कीमती थे कि कंपनी इनका इस्तेमाल मुद्रा (Currency) की तरह करती थी—मसालों के बदले भारतीय कपड़ा दिया जाता था। भारतीय छींट (Chintz) और मलमल उस दौर की सबसे बड़ी विलासिता (Luxury) थे।

यहाँ विडंबना का पहला मोड़ आता है: जिस कपड़े ने भारत को सदियों तक समृद्धि दी, वही विदेशियों को भारत पर कब्जा करने का लालच दे गया।

कार्यशाला से गोदाम तक: एक बड़ा उलटफेर

1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद जब कंपनी को राजनीतिक ताकत मिली, तो उन्होंने एक क्रूर खेल खेला:

प्रतिबंध: ब्रिटेन ने अपने नए कारखानों को बचाने के लिए ‘कैलिको एक्ट’ (1721) पास किया, ताकि भारत से बने-बनाए कपड़ों के आयात पर रोक लग सके।

दोहरी मार: जब ब्रिटेन में मशीनें (जैसे स्पिनिंग जेनी) आ गईं, तो उन्होंने नीति बदल दी। भारतीय कपड़ों पर भारी टैक्स लगा दिया गया, जबकि मशीनों से बने ब्रिटिश कपड़े बिना किसी टैक्स के भारत में भर दिए गए।

नतीजा विनाशकारी था। भारत के महान बुनकर बर्बाद हो गए। जो इलाके दुनिया का सबसे बेहतरीन कपड़ा बनाते थे, उन्हें जबरन सिर्फ कच्चा कपास उगाने का जरिया बना दिया गया ताकि लंकाशायर की मिलें चल सकें।

रेलवे, जिसे अक्सर ब्रिटिश उपहार कहा जाता है, असल में भीतरी इलाकों से कच्चा कपास बंदरगाहों तक ले जाने और मैनचेस्टर का सस्ता कपड़ा गांवों तक पहुँचाने के लिए बनाई गई थी। इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुसार, 1700 में विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी लगभग 25% थी, जो 1947 तक गिरकर सिर्फ 4% रह गई।

सबसे बड़ी विडंबना

भारत इसलिए नहीं हारा कि वह “पिछड़ा” था। वह इसलिए हारा क्योंकि वह अपने काम में ‘बहुत ज्यादा अच्छा’ था। उसकी श्रेष्ठता ही उसके पतन का कारण बन गई। दुनिया को जिस चीज की सबसे ज्यादा तलाश थी, भारत उसी का स्वामी था, और इसीलिए उसे निशाना बनाया गया और ब्रिटिश साम्राज्य का एक कच्चा माल देने वाला गुलाम बना दिया गया।

गांधी का पलटवार

महात्मा गांधी ने इस दर्द को समझा था। उनका जवाब था—खादी। हर भारतीय को खादी कातने और पहनने के लिए कहकर, उन्होंने अपमान के प्रतीक को प्रतिरोध (Resistance) के प्रतीक में बदल दिया। चरखा 20th सदी का सबसे शक्तिशाली राजनीतिक हथियार बन गया।

निष्कर्ष

जिस तरह भारत के गणित ने यूरोप को ऊपर उठाया और बाद में वही ज्ञान गुलामी की जंजीर बनकर लौटा, उसी तरह हमारे कपड़ों के साथ भी यही दुखद कहानी दोहराई गई।

इतिहास का यह सबक स्पष्ट है: जब आप कुछ बहुत ही बेहतरीन बनाते हैं, तो शक्तिशाली लोग उसे छीनने की कोशिश करते हैं—जब तक कि आप अपनी रचना की रक्षा करना न सीख लें। आज भारत के करघे फिर से चल रहे हैं। इस बार, हमें हर धागे के पीछे की पूरी कहानी याद रखनी चाहिए।

रजनीश शर्मा एक लेखक और पुरस्कृत संपादक हैं। उनसे इस ईमेल पर संपर्क किया जा सकता है: rshar121920@gmail.com

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