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जब भारत का अपना ज्ञान ही उसके लिए मुसीबत बन गया — I

लेखक: रजनीश शर्मा

भारत ने उन बौद्धिक औजारों और सोच को विकसित करने में मदद की, जिन्होंने आगे चलकर यूरोप को भारत पर राज करने के काबिल बनाया। जो देश कभी दुनिया का ‘गुरु’ था, वह ‘गुलाम’ बन गया। लेकिन विडंबना (irony) इससे भी गहरी है: जब यूरोपीय भारत आए, तो उन्होंने भारत को ज्ञान के केंद्र के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हमारी परंपराओं को “अंधविश्वास” या “मिथक” कहकर खारिज कर दिया गया। जिस सभ्यता ने आधुनिकता की नींव रखी, उसे ही “पिछड़ा” कह दिया गया। यह केवल एक संयोग नहीं है, बल्कि ज्ञान को हथियाने और उसके इतिहास को मिटाने की एक गहरी साजिश थी।

यह कहानी केवल अपनी व्यथा बताने के लिए नहीं है, बल्कि यह समझने के लिए है कि कैसे ज्ञान एक जगह से दूसरी जगह पहुँचता है और कैसे ताकतवर लोग अक्सर अपने ज्ञान के असली स्रोतों का नाम मिटा देते हैं।

भारत: ज्ञान का झरना और वैश्विक प्रगति के बीज

यूरोप के शक्तिशाली बनने से बहुत पहले, भारत बौद्धिक और तकनीकी नवाचार का केंद्र था। 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक, भारतीय विचारकों ने वह नींव रखी जिस पर आज की आधुनिक दुनिया टिकी है।

गणित और खगोल विज्ञान: आर्यभट्ट और ब्रह्मगुप्त जैसे विद्वानों ने शून्य (Zero) और दशमलव प्रणाली का आविष्कार किया। इनके बिना आज के कंप्यूटर या अंतरिक्ष यात्रा मुमकिन नहीं होती। ‘सूर्य सिद्धांत’ जैसे ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने ग्रहों की स्थिति और ग्रहण की सटीक भविष्यवाणी की।

चिकित्सा: ‘सुश्रुत संहिता’ में मोतियाबिंद के ऑपरेशन और शुरुआती प्लास्टिक सर्जरी का वर्णन मिलता है, जो पश्चिम से सदियों आगे था।

तर्क और दर्शन: उपनिषदों के ऋषियों ने तर्क, नैतिकता और सत्य की खोज के ऐसे तरीके विकसित किए, जिन्होंने दुनिया की सोच को प्रभावित किया। यह अंधविश्वास नहीं, बल्कि ठोस और व्यावहारिक ज्ञान था।

अरब जगत: ज्ञान के प्रसार का माध्यम

8वीं शताब्दी के बाद से, भारत का यह ज्ञान अरब-इस्लामिक दुनिया के माध्यम से पश्चिम की ओर बढ़ा।

भारतीय विद्वानों को बगदाद के दरबारों में आमंत्रित किया गया और संस्कृत ग्रंथों का अरबी में अनुवाद हुआ।

बगदाद का ‘बैत अल-हिकमा’ (ज्ञान का घर), काहिरा और टोलेडो जैसे शहर सीखने के बड़े केंद्र बने।

जिन्हें यूरोप “अरबी अंक” कहता है, वे वास्तव में भारतीय थे। एलजेब्रा (Algebra) पर भी भारतीय गणित का गहरा प्रभाव था।

यूरोप की जागृति: उधार लिए गए औजारों से

12वीं से 15वीं शताब्दी के बीच, यूरोप ने अरबी से लातिनी (Latin) भाषा में हुए अनुवादों के जरिए इस ज्ञान को पाया।

भारतीय गणित ने यूरोप के बैंकिंग, व्यापार और वास्तुकला को बदल दिया।

खगोल विज्ञान के ज्ञान से समुद्री यात्रा और नक्शा बनाना आसान हुआ।

इसी ज्ञान ने यूरोप में ‘पुनर्जागरण’ (Renaissance) और ‘वैज्ञानिक क्रांति’ की जमीन तैयार की। यूरोप ने प्रकृति को समझने के लिए जिन गणितीय और वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया, उनके सूत्र भारत से गए थे।

औद्योगिक क्रांति और उपनिवेशवाद का चक्र

मशीनों के आने से उत्पादन बढ़ा, जिससे नए बाजारों की जरूरत पैदा हुई। यहीं से उपनिवेशवाद (Colonialism) की शुरुआत हुई। विडंबना देखिए, जिस दिशा सूचक यंत्र (Compass), त्रिकोणमिति और वैज्ञानिक सोच के दम पर यूरोपीय जहाज समंदर पार कर भारत पहुँचे, वे विचार कभी भारत से ही निकले थे।

जब अंग्रेज भारत आए, तो उन्होंने तीन काम किए:

भारत की पहचान एक ‘ज्ञान दाता’ के रूप में खत्म कर दी।

भारतीय परंपराओं को “बेतुका” और “तर्कहीन” घोषित कर दिया।

शासन को सही ठहराने के लिए उन्होंने तर्क दिया कि वे भारत को “सभ्य” बनाने आए हैं।

यह चोरी नहीं, बल्कि सच से इनकार था

यह केवल ज्ञान की चोरी नहीं थी, क्योंकि ज्ञान तो विकसित होता ही रहता है। असली अन्याय यह था कि यूरोप ने जानबूझकर यह भुला दिया कि इस ज्ञान का ‘स्रोत’ क्या था। इतिहास को इस तरह लिखा गया जैसे कि सारा विज्ञान और तर्क केवल पश्चिम की देन हो।

आज यह क्यों महत्वपूर्ण है?

यह इतिहास जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि:

यह तय करता है कि भारत खुद को कैसे देखता है।

यह बताता है कि क्यों कुछ ज्ञान को “विश्वव्यापी” और भारतीय ज्ञान को केवल “क्षेत्रीय” माना जाता है।

यह किसी पुरानी शिकायत के बारे में नहीं, बल्कि इतिहास में भारत के सही स्थान को वापस पाने के बारे में है।

निष्कर्ष: भारत ने यूरोप को जगाने में मदद की, और उसी जागृति से पैदा हुए हथियारों का इस्तेमाल भारत को गुलाम बनाने के लिए किया गया। इस सच्चाई को पहचानना इतिहास को बदलना नहीं, बल्कि उसे पूरी ईमानदारी से पढ़ना है।

रजनीश शर्मा एक लेखक और पुरस्कृत संपादक हैं। उनसे इस ईमेल पर संपर्क किया जा सकता है:rshar121920@gmail.com

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