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अतुल के संस्मरणों का सावन (संस्मरणों की बैठक पर अपनी बात)

आओ, अतुल के संस्मरणों के रिमझिम सावन में धीरे-धीरे भीग जाएं।

आओ, इस बरखा-बहार में नहा लें। मेहनत-कसरत और अनुभव अतुल के उनके साथ जिन्हें हमने-आपने पढ़ा। जिन्हें , हमने आपने सराहा और पूजा। वे साहित्य जगत की पावन विभूतियाँ जिन्हें हम उनके चित्रों से देखते-समझते हैं। उनके साथ अतुल बतियाया है। उनके साथ अतुल घूमा-फिरा है। अतुल ने उनके साथ उनकी भव्य उपस्थित में उनकी कविताएं सुनी हैं। अतुल ने उनकी सेवा की है और उन्हें कई मरतबा भोजन परोसा है। इन सबका शुभ आशीष अतुल के साथ है। तभी तो अतुल अपने पिताश्री ओजस्वी स्वतंत्रता सेनानी और महान कवि श्रीराम शर्मा ‘‘प्रेम’’के इन अग्रजों और स्नेहिल साथियों के साथ मन में ही कविताओं को पकाना सीख गया था। अतुल तभी तो कविताओं का पाक-शास्त्री है और अन्य विधाओं में भी मँजा हुआ है। तभी तो पाठको शैलीकार पं0 कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने छोटे सगे भाई तुल्य बीमार श्रीराम शर्मा के लिए अतुल से कहा था कि अतुल तुम चिंता क्यों करते हो। ‘‘ जो आदमी नई दिल्ली की अंग्रेजी पुलिस को चकमा देकर काने वायसराय वैवेल के सामने आँख मटका सकता है। उसके लिए रोग को चकमा देना क्या बड़ी बात है।’’ समझे आप लोग श्रीराम शर्मा जी ने सैंट्रल सैक्रेट्रिएट पर 26 जनवरी 1944 के दिन तिरंगा फहराया था। उन्होंने वह पराक्रम किया था जो बड़े से बड़े स्वतंत्रता सेनानी की छाती को गौरव से फुला दे। प्रभाकर जी ने अतुल से कहा था कि अगर लोग श्री राम शर्मा का यह एक साहसिक काम भी याद कर लें तो वे श्री राम शर्मा का अर्थ समझ जाएंगे।
राष्ट्र कवि सोहन लाल द्विवेदी जब देहरादून आए तो अतुल ने उन्हें दून घाटी में घुमाया था। दून घाटी राष्ट्र कवि को पाकर फूली नहीं समा रही थी। अतुल ने उन्हें कहा कि कुछ ही किलोमीटर जाने पर पहाड़ मिल जाते हैं। जिस समय अतुल राष्ट्र कवि के साथ घाटी की सड़कों पर घूम रहे थे। तब अतुल शर्मा ने उन्हें इशारा करके बताया था कि कहीं-कहीं से मसूरी की जगमग रोशनी दिख जाती है। राष्ट्र कवि बोले, ‘‘यह तो तारे लगते हैं।’’ कुछ देर घूमने के बाद राष्ट्र कवि ने आकाश की ओर नज़र उठाई और अतुल को बताया, ‘‘इन्हें सप्तऋषि कहते हैं।’’ राष्ट्र कवि ने अतुल को सभी सात तारों के नाम भी बताए। उस साल अतुल हाई स्कूल के छात्र थे। अतुल से ही तो हमें पता लगा कि राष्ट्र कवि कांसे का लोटा अपने साथ जरूर रखते थे। क्योंकि अतुल ही राष्ट्र कवि को विदा करने रेलवे स्टेशन गए थे। वे अतुल के घर में भोजन करते समय यह बोले थे, ‘‘अरहर की दाल का वही स्वाद है जैसे हमारे घर का।’’ परन्तु राष्ट्र कवि ने घर पहुँचने के बाद श्री राम शर्मा को पोस्ट कार्ड भेजा और उसमें लिखा, ‘‘आपकी जगह प्रिय अतुल रेलवे स्टेशन तक छोड़ने आए, वे बहुत सौम्य, गम्भीर स्वभाव के हैं उसे मेरा आशीष कहें।’’ ऐसे थे हमारे राष्ट्रकवि। बहुत सरल और स्पष्ट। क्या आपको नहीं लगता कि यह बात राष्ट्रकवि को चुभ गई थी कि श्रीराम शर्मा उन्हें स्वयं छोड़ने रेलवे स्टेशन नहीं गए थे। हमारे लिए दोनों पूज्य हैं। किन्तु यह बात तो हमें भी चुभ रही है।
‘‘चल पड़े कोटि पग ओर उसी ओर……..’’ के रचनाकार राष्ट्रीय कवि सोहन लाल द्विवेदी के बाद चलते हैं महापंडित राहुल सांकृत्यायन की छत्रछाया में। सन् 1950-51 की बात है राहुल जी, श्री राम शर्मा ‘प्रेम’ और विशम्भर सहाय प्रेमी तीनों मिलकर मसूरी में साहित्य चर्चाएं करते थें। महापंडित और श्री राम शर्मा का साथ लम्बे समय तक रहा था। वैसे तो उनका नाम केदारनाथ पांडे था। अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा जैसी चर्चित कृति भला किसने नहीं पढ़ी और सराही है।

जनकवि त्रिलोचन शास्त्री भी अतुल के निवास पर प्रवास कर चुके हैं। अतुल के अनुसार जनकवि संकोची स्वभाव के थे और उनकी बातों में वात्सल्य टपकता था। तब अतुल अपने परिवार के साथ एम.के.पी.पी.जी कॉलेज, देहरादून स्टॉफ क्वार्टर में रहते थे। शास्त्री जी ने अतुल को बताया कि रुड़की से एक सज्जन आए थे जिन्होंने उन्हें अतुल की कविता के बारे में बताया। अतुल की इस कविता में, ‘‘यह सूरज के पेड़’’ पंक्ति त्रिलोचन जी को बहुत पसंद आई थी। उन्होेंने अतुल के घर पर केदारनाथ अग्रवाल, कवि नागार्जुन, नामवर सिंह के साथ-साथ अपने खुद के संस्मरण भी साझा किए थे। शास्त्री जी ने अतुल को पत्र लिखकर आत्मीयता से सुझाया कि अतुल लेखन करते रहें और कविता तभी लिखें जब मन कविता के अनुरूप हो। ऐसे होते हैं महान कवि और साहित्यकार। इतने विनम्रशील इतने संवेदनशील। उन्होंने अतुल को बताया कि तुम्हारे पिता जी बाँस की कलम बहुत बढ़िया बनाते थे। मैंने उनकी बनाई कलम से बहुत लिखा है। ‘‘और हाँ यह बात सच्ची है कि वो तैराक बहुत अच्छे थें और रामचरित मानस की चौपाइयाँ बहुत अच्छी गाते थे।’’
जनकवि नागार्जुन जिनकी कविता ‘अकाल’ की कालजयी पंक्तियाँ, ‘‘कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास/कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास………….कव्वे ने पाखें खुजलाईं कई दिनों के बाद।’’ किसी भी सुधी पाठक को उमंगित कर दे, ऐसे महान जनकवि अतुल के घर में ऐसे आकर ठहरते थे जैसे उनका अपना परिवार हो। आप एक तस्वीर में अतुल की माता और तीनों बहनों को बाबा के साथ खिलखिलाते-मुस्कराते और आनंदित होते देख सकते हैं।
आवारा मसीहा एक ऐसा उपन्यास है जो कथा शिल्पी शरतचन्द्र की जीवनी पर आधारित है। इस उपन्यास संस्मरण के शिल्पी साहित्यकार विष्णु प्रभाकर अतुल के पिताश्री के परम् मित्र थे। वह भी अतुल के घर आए थे। अतुल ने लिखा है कि अक्सर दिल्ली में कनाटप्लेस स्थित मोहन सिंह प्लेस कॉफी हाउस में विष्णु प्रभाकर जी लेखकों के साथ शाम को बैठा करते थे। हिन्दी पाठ्यक्रम में तो वे पढ़ाये ही जाते हैं पर ‘आवारा मसीहा’ को पढ़कर उनकी गम्भीर रचनाशीलता का पता चलता है। गीतकार सोम ठाकुर जिनकी कविता आज भी दिलों में गुनगुना रही है और कह रही है, ‘‘मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर/सौ-सौ नमन कँरू/ उत्तर अमरनाथ दख्खिन में रामेश्वर मन मोहे……./ कान्हा रास रचे वृंदावन में यमुना के तीर।’’ वह भी अतुल परिवार के पारिवारिक संबंधी रहे है। वे पत्नी सहित अतुल के सुभाष रोड स्थित जाफरी वाला टीन की छत के मकान में रहे थे। उस ठंडियों की रात बहुत तेज वर्षा हो रही थी। अतुल के घर का टीन तेज वर्षा से जूझ रहा था। यकायक लाईट चली गई। दो मोटी मोमबत्तियाँ जलाई गईं। घर के अंदर से लकड़ियों के टुकड़े इकट्ठे किए गए। घर धुएं से भर गया। धुँआधाार होने के बाद वे लकड़ियाँ भी आखिरकार जलने को तैयार हुई। अब क्या किया जाए। साहित्य की चर्चा कविता की बात में तो समय तेजी से निकलता है। मन नहीं भरता। रात बची थी। फिर एक टूटी कुर्सी के पाये तोड़ताड़कर आग दुबारा जीवित की गई और पूरे परिवार की साहित्य बैठक चलती रही। अतुल की माता जी और ठाकुर साहब की पत्नी एक तरफ सोफे में बैठे रहे। ठाकुर साहब बोले, ‘‘अतुल तुम सुनाओ’’। अतुल ने अपनी कविता आग सुनाई। क्योंकि, शायद उस रात साहित्य के साथ-साथ आग का ही सहारा था। बहरहाल, उसके बाद अतुल की बहन रंजना और रीता ने अपने पिता की सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय कविता ‘मसूरी’ सुनाई। और हाँ आग जलाने के आंदोलन में ठाकुर साहब ने भी बढ़-चढ़कर योगदान दिया था। जिस तरह तसला गरम था उसी तरह पूरे परिवार का साहित्यिक मन भी आग तापने का आंनद उठा रहा था। इन दोनों परिवारों का आत्मीय संबंध चलता रहा। एक समय था कि दून घाटी की पहचान बन गई थीं कहानीकार शशि प्रभा शास्त्री। कहानीकार शास्त्री अतुल के पिताश्री की छोटी बहन जैसी थी। वे एम.के.पी.पी.जी कॉलेज देहरादून में हिन्दी विभागाध्यक्ष थीं। श्रीराम शर्मा उन्हें साहित्यिक गतिविधियों में मार्गदर्शन सुलभ कराते रहते थें। वह भी अतुल के पिताश्री से साधिकार मार्गदर्शन पाती रहीं। इनके साथ भी नन्हें अतुल शर्मा की कई यादगार गुदगुदाने वाली बातें साझा की जा सकती हैं। पुस्तक में यह सब मौजूद है।
गीतकार वीरेन्द्र मिश्र भी देहरादून कवि सम्मेलन में आते थे। हिन्दी काव्य साहित में उनकी अनूठी रचना, ‘‘अविराम चल मधुवन्ती’’ को चर्चित गीत संग्रह माना जाता रहा है। नवगीतों के उन्नायक वीरेन्द्र मिश्र भी अतुल शर्मा के घर ठहरे थे। अतुल के घर में उनके आने से उत्सव जैसा वातावरण हो गया था। वे अतुल के पिताश्री को प्रेम दद्दा कहते थे। किसी खास व्यक्ति के दुखद निधन के कारण कवि सम्मेलन टल गया था। भले ही औरों ने कवि सम्मेलन न होने के बावजूद पारिश्रमिक लिया था किन्तु वीरेन्द्र मिश्र ने अस्वीकार कर दिया था। वे बोले थे, ‘‘पैसा बहुत कुछ है पर सब कुछ नहीं।’’ ऐसे थे मिश्र जी। कवि डॉ0 धनंजय सिंह भी अतुल परिवार के स्नेहिल साहित्यकार थे। उनकी कविता, ‘‘हमने कलमें गुलाब की रोपीं थी/पर गमलों में उग आई नाग फनी।’’ बहुत सराही जाती है। यह ऐसे कवि हैं जो सरल, सहज और गहराई से सोचने वाला स्वभाव रखते हैं। वे श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’ पर लिखी गई पुस्तक के विमोचन समारोह में उपस्थित थे। मेहमान बनकर आए किन्तु सहयोगी बनकर कार्यक्रम की तैयारी में हिस्सा बँटाने लगे थे।
कवि देवराज दिनेश भी ऐसे ही आत्मीय और पारिवारिक साहित्यकार रहे है। अतुल इन्हें प्रेम से चाचा जी कहते थे। वे पंजाब के राज्य कवि थे। उनकी प्रसिद्ध कविता भारत माता की लोरी बहुत लोकप्रिय रही है। एकबार जब अतुल अपनी कविताओं के पाठ हेतु दिल्ली गए तो उन्हें अपने प्रिय चाचा देवराज दिनेश के स्नेह की पराकाष्ठा से साक्षात्कार हुआ। अतुल खो गए थे। फोन से सम्पर्क साझा तो चाचा बोले वहीं ठहरो, कॉफी हाउस में। यहाँ, कॉफी हाउस में नन्हें अतुल की कई दिग्गजों से प्रत्यक्ष और परोक्ष मुलाकात हुई। जिनमें मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर और मुद्राराक्षस जैसे साहित्यकार शामिल हैं। बहरहाल देवराज दिनेश ऊँचे दर्जे के साहित्यकार और श्रीराम शर्मा को वे अपना बड़ा भाई मानते थे। ऐसी ही चुटकीली और गुदगुदाने वाली बातें कालिका प्रसाद काला के साथ भी जुड़ी हुई हैं। वे आकाशवाणी के समर्पित प्रोड्यूसर रहे हैं। वे अतुल को उनकी बहुआयामी रचनाधर्मिता के लिए खूब सराहा करते थे। कवि डॉ0 शेरजंग गर्ग भी ऐसे ही साहित्यकार हैं जिनके लिए श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’ परम आदरणीय थे। वे जब देहरादून कवि सम्मेलन के लिए आए तो कवि सम्मेलन में भाग लेने के बजाय बीमार श्रीराम शर्मा के सिरहाने जाकर बैठ गए। उन्हें न तो इस बात की परवाह थी कि वे कविता पाठ नहीं कर पाएंगे बल्कि वे पारिश्रमिक को भी तरजीह नहीं दे रहे थे। उन्होंने कहा भी था कि पारिश्रमिक से बड़ा अपनापन और दायित्व था, जो निभाना था।……….और उन्होंने निभाया। डॉ शेरजंग गर्ग की एक कविता कहती है, टूट कई हैं जो तलवारें/उनकी मूठें हैं हम लोग। आप अतुल शर्मा द्वारा महान कवि शेरजंग गर्ग को सम्मानित करते हुए यहाँ भी देख सकते हैं।

भूमिहीन साहित्यशील अतुल परिवार                                    
इस सजीव वाचनालय को
पहले तो हृदय-घर दो
इस सस्मरणों की बारात के माँझी को
हार्दिक स्वागत सहित पावन गंगा तट दो
जुटा ना सको इतना नैतिक बल तो
थोड़ा सा ठौर-ठिकाना ही दे दो
सरकार हो सरकार
सरकार सा सरल होकर
स्वतंत्रता सेनानी आश्रित परिवार को भी भगवन्
इनका मूल अधिकार
मामूली सा घर दे दो।
सावित्री पुत्र वीर झुग्गीवाला (वीरेन्द्र देव गौड़)

 

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