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क्षेत्रीय दल हुए फ्लाॅप

– अनसूया प्रसाद मलासी

-नेशनल वार्ता न्यूज़

उत्तराखंड की बागेश्वर विधानसभा के उप-चुनाव नतीजे कोई अधिक चौंकाने वाले नहीं रहे। यहां भाजपा प्रत्याशी पार्वती दास ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के बसंत कुमार को 2405 मतों के मामूली अंतर से हरा कर जीत दर्ज की। क्षेत्रीय दल का झंडा उठाने वाले एकमात्र उत्तराखंड क्रांति दल के प्रत्याशी को 716, समाजवादी पार्टी को 580 तथा उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी को 248 वोट पड़े। इन तीनों दलों से अधिक वोट तो नोटा 1125 ले उडा़।

उत्तराखंड राज्य बने हुए पूरे 23 बरस बीत चुके हैं। शुरू से ही इस राज्य में अफरा-तफरी का सा माहौल है। उत्तराखंड राज्य की स्थाई राजधानी पर्वतीय क्षेत्र भरारीसैंण (गैरसैंण) में बनाने, मूल निवास प्रमाण-पत्र पुनः लागू करने, जंगली जानवरों की समस्या, कृषि को पूर्व की भांति अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल करने. सरकारी नौकरी और बडे़ संस्थानों में स्थानीय युवाओं को तृतीय व चतुर्थ श्रेणी में अनिवार्य रूप से नियुक्ति देने जैसे मुद्दे सामने खड़े हैं।

दुर्भाग्यवश, उत्तराखंड राज्य आंदोलन को नेतृत्व देने और इसके लिए पूरा यौवन/जीवन बलिदान करने वाले उक्रांद, उत्तराखंड के इन ज्वलंत मुद्दों का नेतृत्व करने में फ्लॉप रहा है। दल के शीर्ष नेतृत्व में राजनीतिक अपरिपक्वता, केकड़ा प्रवृत्ति पनपने और एक, दूसरे के प्रति अविश्वास और अहंकार की भावना ने इस लोकप्रिय दल की लुटिया डुबो दी है। यही इस राज्य का आज सबसे बड़ा अभिशाप है कि कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ उत्तराखंड में यूकेडी एक मजबूत विकल्प दे सकता था, मगर इसमें गलतियाँ दोनों तरफ से हैं, उक्रांद की तो हैं ही, मगर जनता जनार्दन (मतदाताओं) की तरफ से इससे भी कहीं अधिक ….

विगत महीने देश में एक नए राजनीतिक गठबंधन आईएनडीआईए को उत्तराखंड में समर्थन देने के ऐलान पर विचार करने वाले यूकेडी के कर्ताधर्ता पूर्व विधायक व अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी सुर्खियों में आये थे। उनके इस विचार को सिरे से खारिज करते हुए यूकेडी में जबरदस्त कलह पैदा हुई और स्थिति दल के दो-तीन फाड़ होने तक आ गई। उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस राज्य की अवधारणा को व्यवहार में उतारने में बुरी तरह असफल रहे हैं। राजनीतिक दलों के अलावा राज्य की जनता भी इन दोनों बड़े दलों को कोसते थकती नहीं रही है, मगर क्षेत्रीय दलों की हालत देखते हुए भी लोगों के पास यही एकमात्र विकल्प (सत्ता की अदला-बदली) रह जाती है।

उत्तराखंड में इस समय उत्तराखंड क्रांति दल और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी ही क्षेत्रीय राजनीति के झंडाबरदार हैं। चुनाव से इधर वह समान विचार धारा वाले अन्य राजनीतिक दलों से चुनाव में ‘थर्ड फ्रंट’ बनाने की दौड़ करते रहते हैं, मगर तीसरी ताकत के नाम पर चौकड़ी भरते क्षेत्रीय दलों के सपने आपस में रगड़ खाकर चूर-चूर हो गए हैं और दावे चुनावी संघर्ष में उतरने से पहले ही पंचर हो जाते हैं। पिछले लंबे समय से गैर भाजपा, गैर कांग्रेस के अलावा संपूर्ण छोटी-बडी़ पार्टियों को साथ लेकर गठबंधन करने की कोशिश करते रहते हैं, मगर यह दल और उनके नेता स्वयं ही दल के नाम पर दलदल हैं और उसी में धंस-फंसकर बेदम हुए जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए पृथक पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के लिए 24-25 जुलाई 1979 को क्षेत्रीय दल उक्रांद का जन्म हुआ था। तब से कई उतार-चढ़ाव इस दल ने देखे। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद खंडूडी़ सरकार में दल की महत्वपूर्ण भागीदारी रही। पहली बार फ्रंट डोर से सत्ता सुख का अवसर मिला। (यह बात दीगर है कि कांग्रेस और मुलायम सिंह यादव की सरकार में भी बैक-डोर से उक्रांद नेता सत्ता सुख भोगते रहे हैं।

उत्तराखंड राज्य आंदोलन के संघर्ष में उत्तराखंड क्रांति दल मुख्य भूमिका में रहा। भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा, वामपंथी सब उसके पीछे खड़े हो गए थे। जनता उक्रांद के कार्यक्रमों में बढ़कर भागीदारी कर रही थी। अपरिपक्व राजनीति और दल के नेताओं को एक दूसरा फूटी आंख से नहीं सुहाने के कारण वे राष्ट्रीय दलों की चकड़ैती में फंस गये और उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति बना दी गई। उक्रांद का उसमें विलय कर दिया गया। दल के कार्यकर्ता उसमें विलीन हुए और झंडा भी उसी में समा गया (नश्यन्ते बहुनायकाः)। बाद में राष्ट्रीय दलों के लोग अपने-अपने बिलों में घुस गये और उक्रांद कार्यकर्ता चौराहे पर ठगे से खड़े रह गये।

समय आ गया है कि उक्रांद में अब दूसरी पंक्ति के नेताओं को बागडोर सौंप दी जाए और राज्य आंदोलन के तपस्वी नेताओं का मार्गदर्शन लिया जाए। राज्य में जहां भी जन आंदोलन होते हैं, दल के नेता और कार्यकर्ता फिर से पुराने तेवर दिखाकर लडे़ं-भिड़ें और लोगों का विश्वास हासिल करने की कोशिश करें। यह सत्य है कि राज्य में अब वामपंथ सिर्फ कागजों में ही सिमटकर रह गया है। इससे कांग्रेस और भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है। जितने भी छोटे-बड़े राजनीतिक संगठन हैं, साझा कार्यक्रम देकर उन्हें भी अपने साथ एकजुट किया जाना चाहिए। बागेश्वर उपचुनाव से सबक लेकर यह जरूरी हो गया है कि देश के विभिन्न राज्यों की तरह उत्तराखंड में भी क्षेत्रीय दल को लोग (मतदाता) महत्व दें।

 


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