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ललितादित्य मुक्तापीड कश्मीर का महाबली राजा (724 से 760 ई.)

ललितादित्य के मंदिरों के विध्वंस
-वीरेन्द्र देव गौड़, पत्रकार, देहरादून
कश्मीर के महाराजा ललितादित्य मुक्तापीड ऐसे हिन्दू राजा रहे हैं जिन्होंने भारत को सांस्कृतिक और धार्मिक उत्कर्ष प्रदान किया। सम्राट ललितादित्य कारकोटा राजवंश के सबसे पराक्रमी राजा सिद्ध हुए। जिनका साम्राज्य आज के भारत वर्ष से कई गुना बड़ा था। महाकवि और इतिहासकार कल्हन ने अपनी राजतरंगिणी में दावे से कहा है कि सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड महापराक्रमी सम्राट थे। सम्राट ने मध्य भारत के पराक्रमी राजा यशोवर्मन को हराया था। उसके बाद मुक्तापीड दक्षिण भारत और पूर्वी भारत तक गया था और सभी राजाओं को परास्त किया था। उसका साम्राज्य आज के अफगानिस्तान से लेकर मध्य एशिया तक था। 1947 के भारत के अधिकांश हिस्सों में मुक्तापीड का सीधा प्रभाव था। मुक्तापीड ने तब की उभर रही जिहादी शक्तियों को भी बार-बार सबक सिखाया था। इसीलिए जिहादी शक्तियाँ जो ईरान सहित खाड़ी देशों से लेकर टरकी तक पनप रही थीं वे मुक्तापीड के विध्वंस के ताक में थी। ऐसा करके ही तब की जिहादी शक्तियाँ कश्मीर सहित पूरे भारत पर हावी हो सकती थी। इन जिहादी शक्तियोें को अपने मजहब का प्रचार करना था। ललितादित्य ने कश्मीर मेें बड़े-बड़े मन्दिर परिसर बनवाये थे। ललितादित्य एक बेजोड़ सेनापति और योग्य सम्राट होने के साथ-साथ कला प्रेमी था। उसने बड़े-बड़े मन्दिर परिसरों को शिक्षा का केन्द्र भी बनाया। उसके सबसे बड़े मन्दिर परिसरों में मार्तंड सूर्य मन्दिर रहा है जिसके विध्वंस आज भी सर उठाए खड़े हैं। उसने कई नगर भी बसाए। उसके द्वारा बसाए गए मुख्य नगरों में परिशासापुर भी शामिल है। हालाँकि, ललितादित्य ने अपने पूर्वजों की राजधानी श्रीनगर को भी बराबर महत्व दिया। ललितादित्य राजा दुर्लभक्ष के सबसे छोटे पुत्र थे। ललितादित्य की माता का नाम नरेन्द्र्रप्रभा था। ललितादित्य ने 36 साल 7 महीने और 11 दिन राज किया। ललितादित्य के राज को लेकर तिथियों में थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है लेकिन उसके पराक्रम और प्रभाव को लेकर कोई दो मत नहीं। ललितादित्य ने 1947 तक के विशाल भारत के चप्पे-चप्पे पर ना केवल अपना डंका बजवाया था बल्कि उसने विध्य पर्वत माला के आप-पार एक सड़़क का निर्माण भी कराया था। एक समय ऐसा भी था जब युद्ध की थकान मिटाने के लिए ललितादित्य के वीर सैनिक केरल के नारियलों का जूस पीते थे और केरल समुद्र तट पर घूमते थे। यही नहीं ललितादित्य की सेना भारत के टापुओं तक भी गई। उस वक्त किसी राजा में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे ललितादित्य का विरोध कर पाते। ललितादित्य की सेना द्वारिका भी गयी थी और और उसने अवंती राज्य में अपना झण्डा फहराया था। इस तरह उत्तर पथ, दक्षिण पथ और पूर्व के सभी महत्वपूर्ण पथों पर ललितादित्य की सेनाओं ने अपना ध्वज फहराया था। ललितादित्य दक्षिण भारत से लेकर पूर्वी भारत तक के विजय अभियान में इतना व्यस्त हो गया कि उसे वापस कश्मीर जाने की इच्छा भी नहीं हुई। वह अपने पराक्रम की धाक जमा देना चाहता था। श्रीनगर से दूत भेजे गए कि आखिर सम्राट गए तो कहाँ गए। जब दूत सम्राट तक पहुँचे तो वे सम्राट को जीवित नहीं पा सके। अपने जीत के अभियानों में युद्ध के दौरान नहीं बल्कि किसी प्राकृतिक आपदा का सम्राट शिकार हो गए बताए जाते हैं। जो भी हो ललितादित्य एक पराक्रमी और दूरदर्शी सम्राट थे। उनके बनाए हुए मंदिर परिसर आज भी ध्वंस अवस्था सीना ताने खड़े हैं। बताया जाता है कि जिहादी आक्रांताओं ने इन मंदिर परिसरों का विध्वंस किया था। क्योंकि जिहादी आक्रांता बुतपरस्ती के खिलाफ खुद को बुत शिकन साबित करने की होड़ में रहते थे। बुत शिकन का मतलब होता है मूर्तियों और मन्दिरों का विध्वंस करने वाला। पूरे भारत में जिहादी आक्रांताओं ने असंख्य मन्दिरों का विध्वंस किया। शायद ही कोई भव्य मन्दिर हो जिसे जिहादी आक्रांताओं ने तहस-नहस ना किया हो। जो दर्दनाक कहानी कश्मीर की है वही पूरे भारत की है। भारत सरकार को और जम्मू कश्मीर के ले. गवर्नर को ललितादित्य मुक्तापीड के समय के ध्वंस किए गए मंदिर परिसरों का उद्धार करना चाहिए। इसकी शुरूआत मार्तंड मन्दिर परिसर से की जानी चाहिए।


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