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भोले बाबा की शिला ने आकर केदार धाम को बचाया

-नेशनल वार्ता ब्यूरो-

9 साल पहले की वह रात(16-17 जून 2013) केदारनाथ पर कहर बनकर आई थी। इस प्रलय में भगवान केदार के प्रांगण से लेकर गौरीकुण्ड तक तबाही का मंजर था।  गौरीकुण्ड के आस-पास भी सब कुछ तबाह हो गया था। गौरीकुण्ड के बाद भी यह प्रलय बहुत घातक थी। कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि केदारनाथ धाम को आज जैसा स्वरूप कोई दे पाएगा। आज केदारनाथ धाम का कायाकल्प हो चुका है। तबाहियों को दुरूस्त कर दिया गया है। परन्तु, हमें इस तबाही के कारण को कभी नहीं भूलना चाहिए। केदारनाथ धाम की पीठ वाले पहाड़ की चोटी पर झील के टूटने से यह प्रलय आई थी। वहाँ ग्लेशियर टूट कर झील में गिरा और झील टूट गई। आज यह झील किस स्वरूप में है पता नहीं। यह है भी या नहीं। जो भी हो हमें ग्लेशियरों और झीलों पर पैंनी नजर रखनी चाहिए। इस काम के लिए ड्रोन इस्तेमाल करने चाहिएं। रोज-रोज नहीं तो हर हफ्ते एक रिपोर्ट तैयार होनी चाहिए। यह रिपोर्ट किसी भी घातक बदलाव की जानकारी दे सकती है। वैसे भी आपदा प्रबंधन विभाग को इस मामले में चुस्ती दिखानी चाहिए। आपदा प्रबंधन विभाग के पास सक्षम ड्रोन होने चाहिएं। केदारनाथ और बदरीनाथ के ग्लेशियरों पर ही नहीं बल्कि पूरे उत्तराखण्ड के ग्लेशियरों और झीलों का हफ्तेवार विवरण होना चाहिए। अगर ऐसा हो रहा है तो अच्छी बात है। नहीं हो रहा है तो इस कमी को दूर करना चाहिए। हमें हर मामले में वैज्ञानिक सोच रखनी चाहिए। हिमालय क्षेत्र की संवेदनशीलता से कौन परिचित नहीं है। क्या हम इस संवेदनशीलता को लेकर संवेदनशील हैं। आपदा प्रबंधन विभाग को उत्तराखण्ड के संबन्धित वैज्ञानिकों से लगातार संपर्क में रहना चाहिए। तभी जाकर हम केदारनाथ जैसी 2013 वाली भयानक विपदाओं से प्रभावी ढंग से निपट पाएंगे। जानोमाल की हांनि पर अंकुश रख पाएंगे। समय रहते बचाव की मुद्रा में आ पाएंगे। आपदा का न्यूनीकरण कर पाएंगे। 2013 में अगर सावधानी बरती गई होती तो विपदा को आने से भले ही हम रोक ना पाते लेकिन इस विपदा से धन और जन की जो हानि हुई उसे न्यूनतम कर सकते थे। उस भयानक विपदा ने अनगिनत जानों को लील लिया था। कुछ लोग तो कई साल बाद पागलों की स्थिति में पाए गए थे। कुछ ऐसे भी दुर्भाग्य मारे थे जो आज तक नहीं मिल पाए हैं। आज 9 साल बाद हम सूचना तकनीकि में काफी आगे निकल चुके हैं। इस तकनीकि का हमें लाभ उठाना चाहिए। उत्तराखण्ड के बच्चों को ग्लेशियरों और प्राकृतिक झीलों की जानकारी देनी चाहिए। इनके आकार प्रकार में हो रहे बदलाव की भी जानकारी देनी चाहिए। उत्तराखण्ड के विद्यार्थियों को भी पल-पल की जानकारी होनी चाहिए। क्या हम इस हद तक सचेत होना चाहते हैं। क्या इस राज्य का मुख्यमंत्री इस दिशा में कभी सोचता है। क्या देश का प्रधानमंत्री ही सब कुछ करेगा। उत्तराखण्ड देश का ऐसा राज्य है जहाँ आपदा प्रबंध के लिए मंत्रालय का गठन सबसे पहले हुआ था। बाबा भोलेनाथ की कृपा देखिए कि जब ऊपर से सैलाब आया और यह सैलाब सब कुछ बहाकर ले गया। तब चमत्कार देखिए कि एक बहुत बड़ी शिला भोलेनाथ के शिवालय के ठीक पीछे आकर टिक गई। इस दैवीय शिला ने केदारधाम के मुख्य मंदिर एवं शिखर की रक्षा की। अगल-बगल का सब कुछ बह गया। कहा तो यह जाता है कि उस भयानक आधी रात को धाम के ऊपर पहाड़ पर बादल फटा था। जो भी हो यह प्राकृतिक आपदा विध्वंसक थी। इसीलिए आपदा प्रबंध मंत्रालय को स्वयं को अपडेट करना पड़ेगा ताकि ऐसी विपदाओं को समय पर ताड़ा जा सके। व्यापक तबाही के बावजूद गौरीकुण्ड का कुण्ड भी सुरक्षित रह गया। यह भी एक चमत्कार ही कहा जाएगा।

-वीरेन्द्र देव गौड़, पत्रकार, देहरादून

 

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