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द कश्मीर फाइल्स में भड़कते अँगारे

तेजनारायण अग्रवाल, पल्लवी जोशी और अभिषेक अग्रवाल ने द कश्मीर फाइल्स को प्रोड्यूस करके देश के लोगों को उस बेरहम सच से अवगत कराया है जिसका सामना कश्मीर के हिन्दुओं ने 32 साल पहले किया। 32 साल पहले फारूख अब्दुल्ला की मिलीभगत से जिहादियों ने कश्मीर मंे जिहाद बरपाया था। फारूख अब्दुल्ला लन्दन खिसक लिया था। क्योंकि वह जानता था कि वहाँ जिहाद की पूरी इबारत लिखी जा चुकी थी जिस पर अमल होना था। अमल हुआ भी। किसी ने फारूख अब्दुल्ला और कश्मीर के अन्य मुसलमान नेताओं पर कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया। जबकि कश्मीर के तमाम मुस्लिम नेता जिहाद में यह तो प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे या फिर परोक्ष रूप से जिहाद की आग को भड़का रहे थे। कहा जाता है कि तब कश्मीर में करोडों़ मुसलमान थे और हिन्दू आबादी बामुश्किल तीन-साढ़े तीन लाख थी। यानी कश्मीर में हिन्दू सदैव अल्प संख्यक रहे हैं। तब कांग्रेस केन्द्र की सत्ता पर विराजमान थी। देश में अल्प संख्यकों को पलकों पर बिठाया जाता है जबकि कश्मीर में अल्प संख्यकों का नरसंहार हुआ और पूरा देश खामोशी की चादर ओढ़े बैठा रहा। मानवाधिकारवादी, सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे क्योंकि अत्याचार हिन्दुओं पर हो रहा था। हिन्दुओं के मानवाधिकार कोई मायने नहीं रखते क्योंकि देश सैक्युलर है। बलात्कार तो आम बात थी औरतों को जिन्दा आरों से चीरा गया था। छातियों पर जिन्दा लोहे की कीलें ठोंकी गयी थी। तसल्ली से जिहाद बरपाया गया था। बर्बर जिहाद के खिलाफ बोलना भारत में गुनाह है। फिल्म इन्डस्ट्री मूँछों पर ताव देते नहीं थकती। अपनी तारीफें करते नहीं थमती। किन्तु किसी ने हिन्दुओं पर हुए अत्याचार पर फिल्म नहीं बनाई। किसी ने कैराना में हुए जिहाद पर भी फिल्म नहीं बनाई। किसी ने पश्चिम बंगाल में करीब 5 साल पहले हुए जिहाद पर फिल्म नहीं बनाई। अब कुछ वीर पुरूषों और एक नारी ने मिलकर हकीकत दिखाई है तो कुछ राजनीतिज्ञ इसके विरोध में तिलमिला रहे हैं। बहरहाल, इस फिल्म को देखा जाना चाहिए। भारत के अधिकतर लोगों को पता नहीं कि जिहाद की असलियत क्या है। यह फिल्म देखकर शायद कुछ समझ में आए। इस फिल्म में पल्लवी जोशी ने अभिनय भी किया है। उनके पति विवेक अग्निहोत्री ने इस फिल्म को निर्देशित किया है। मिथुन चक्रवर्ती ने भी फिल्म में काम किया है। इस फिल्म को पूरे देश में टैक्स मुक्त होना चाहिए। इस फिल्म की पूरी यूनिट को भरपूर सम्मान दिया जाना चाहिए। अनुपम खेर कह रहे हैं कि उन्होंने अभिनय नहीं किया। उन्होंने तो दिल के दर्द को बयां किया है। जो भी हो यह फिल्म बनाकर इन सभी ने बहुत बड़ा काम किया है। -सावित्री पुत्र वीर झुग्गीवाला (वीरेन्द्र देव), पत्रकार, देहरादून।


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