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लोकतंत्र की बेड़ियां तोड़ता नेपाल

-एम0 एस0 चौहान

दुनियाँ भर के लोकतांत्रिक/प्रजातंत्र राष्ट्रों में लोकतंत्र की स्थिति वर्तमान में दुनियाँं भर के लोकतांत्रिक देशों के हालातों को देखते हुए कहा जा सकता है बमुश्किल लोकतंत्र बहाल है। प्रजातांत्रिक देशों में कितने देश वास्तव में नागरिकों की इच्छा का प्रतिनिधित्व कर रहे होंगे उन राष्ट्रों की राजनीति व कूटनीति विशलेषण करने पर पता चलता है कि लोकतंत्र की स्थिति कुछ सकारात्मक नहीं कही जा सकती। जहां विश्व का पहला लोकतंत्र चलाने वाला देश आयरलैण्ड है जो वर्ष 1919 में स्वतंत्रता प्राप्त करके एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना। ग्रीस, दुनिया का पहला लोकतांत्रिक देश है एवं इकोनॉमिस्ट ग्रुप द्वारा प्रकाशित लोकतंत्र सूचकांक भारत को एक ‘‘त्रूटिपूर्ण लोकतंत्र’’ के रूप में वर्गीकृत करता है। फ्रीडम हाउस भारत को आंशिक रूप से स्वतंत्र के रूप में वर्गीकृत करता है।
लोकतंत्र की उत्पत्ति 2400 वर्ष पूर्व प्राचीन ग्रीस में हुई थी, एथेनियाई लोगों ने 580-507 ई0पू0 में प्रथम लोकतंत्रों में से एक की स्थापना की। क्लीस्थेनेस को एथेनियन लोकतंत्र का जनक माना जाता है। एथेंस में विधान सभा सहित प्रत्यक्ष लोकतंत्र था वहीं रिपोर्टस विदाउट बॉर्डर्स द्वारा प्रकाशित विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 2023 में भारत 180 देशों में 161वें स्थान पर था। भारतवर्ष द्वारा 1950 में अपने लिखित संविधान के साथ एक आधुनिक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाया गया जो आज भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक है। वहीं दुनियाँ का सबसे पुराना लोकतंत्र संयुक्त राष्ट्र अमेरिका है जो लगभग 1889 से अधिक लोकतंत्र है। वर्तमान समय में दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक उठा-पठक के कारण नागरिकों की इच्छा का प्रतिनिधत्व करने की लोकतांत्रिक सोच देश-दुनिया के लोकतांत्रिक राष्ट्रों में दम तोड़ती दिखती है, वहीं टपेनंस ब्ंचपजंसपेज के अनुसार वर्ष 2024 में दुनिया की केवल 6.6 प्रतिशत आबादी ही पूर्ण लोकतंत्र का हिस्सा थी। जहां कि पूर्ण रूप से नागरिकों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करने की कल्पना की जा सकती है। ैजनकलण्ब्वउ के अनुसार दुनिया में 90 से 110 लोकतांत्रिक देशों के होने की सम्भावना है परन्तु धरातल पर लोकतंत्र का कितना सम्मान लोकतांत्रिक राष्ट्रों एवं वहां के राजनेताओं द्वारा किया जा रहा है वस्तुस्थिति पिछले कुछ समय में दुनिया भर में स्पष्ट है क्योंकि सत्ता पर काबिज राजनीति दल अपने-अपने हितों को साधने में ज्यादा रूचि दिखाते हैं जिससे वह सत्ता पर अधिक से अधिक समय तक बने रहें इस हेतु ऐसे लोकतांत्रिक राष्ट्र जहां पर भिन्न-भिन्न धर्म व वर्ग के लोग रहते हैं वहां किसी खास धर्म व वर्ग को ज्यादा तवज्जो देना भी लोकतांत्रितक व्यवस्थाओं को खण्डित करता है वहीं लोकतांत्रिक राष्ट्रों में राजनेताओं द्वारा अपने-अपने हित साधने के चलते भी लोकतांत्रिक व्यवस्थायें देश-दुनिया में चरमरा गयी है जहां पर नागरिकों के सम्मान व इच्छा का प्रतिनिधित्व करना दुष्कर है। वहीं अगर भारतवर्ष की बात की जाये तो पूर्व से ही भारतवर्ष की लोकतांत्रिक व्यवस्था की दुनिया भर ने तारीफ की जाती रही है तथा दुनिया भर में माना जाता रहा है कि भारतवर्ष एक मजबूत लोकतंत्र है व सम्भावना निहित है, परन्तु पिछले कुछ समय से दुनिया भर में लोकतंत्र मात्र विभिन्न राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय मंचों से लोकतांत्रिक चहरा व पहचान बनाने मात्र तक ही सीमित रह गया है। लोकतांत्रिक/प्रजातांत्रिक राष्ट्रों में भारतवर्ष को दोषपूर्ण लोकतंत्र के रूप में देखा जाने लगा है जो कि वर्तमान समय में राजनीतिक कारणों से लोकतंत्र को बेहतर नहीं कहा जा सकता। कह सकते हैं भारत, ग्रीस, ब्राजील, क्रोएशिया जैसे देशों में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं मौजूद हैं लेकिन वे इतनी मजबूत नहीं हैं कि इन पर गर्व किया जा सके। विषय चिन्तनीय है कम से कम भारतवर्ष जैसे राष्ट्रों को इस पर विचार करना चाहिए, भारत के पड़ोसी देशों में भी नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश की लोकतांत्रिक व्यवस्था लगभग चरमरा चुकी है जहां लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं मौजूद हैं परन्तु मजबूत नहीं कही जा सकती, वहीं वर्तमान में नेपाल में गृह युद्ध जैसी स्थिति है वहां पर नेपाल सरकार द्वारा बिना किसी कारण सोशल मीडिया को बैन कर दिया गया जिससे कि सत्ताधारी पार्टी का भ्रष्टाचार उजागर ना हो पाये व पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश में भी कमोबेश यही स्थिति उत्पन्न होती रही है, यह सब लोकतंत्र के दमन की एक ज्वलन्त घटना कही जा सकती हैं। देश-दुनिया लोकतांत्रिक राष्ट्र होने का गौरव तो महसूस करना चाहते हैं परन्तु वास्तव में जमीनी हकीकत हवाई किलों से ज्यादा और कुछ भी नहीं है, जहां भारतवर्ष को कभी मजबूत लोकतंत्र की दृष्टि से दुनिया भर में देखा व सम्भावना आंकी जाती रही। वहीं मौजूदा समय में इसे कुछ बेहतर नहीं कहा जा सकता। बेहतर होगा कि देश-दुनिया के लोकतांत्रिक राष्ट्र अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रियायें मजबूत करें एवं अपने नागरिकों का लोकतांत्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत उनकी इच्छाओं का प्रतिनिधित्व व सम्मान करें जिससे अधिक से अधिक लोकतांत्रिक राष्ट्रों में जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व ईमानदारी के साथ किया जा सके एवं एक स्वस्थ जनमत के तहत लोकतंत्र का प्रतिनिधत्व हो सके।

साभार- वादियों की आवाज 

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