कानपुर। कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर काम करने वाले छोटे और गरीब वेंडरों को कथित तौर पर कुछ लोग अपने आपको मीडिया कर्मी बताकर डराने-धमकाने और अवैध वसूली करने का आरोप सामने आया है। आरोप है कि कुछ लोग यूट्यूब चैनल या सोशल मीडिया आईडी बनाकर खुद को पत्रकार बताते हैं और वेंडरों के गोदामों व कारोबार के वीडियो बनाकर खबर चलाने की धमकी देते हैं।
वेंडरों का आरोप है कि वीडियो और खबर के नाम पर उनसे पैसे की मांग की जाती है। पैसे नहीं देने पर उनके खिलाफ वीडियो वायरल करने या बदनाम करने की धमकी दी जाती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि ऐसे कथित मीडिया कर्मियों की पहचान, संस्थान और पत्रकारिता से जुड़े दावों की वैधता की जांच कौन करेगा?
कानपुर सेंट्रल पर वैध और अवैध वेंडरों को लेकर रेलवे पहले भी अभियान चला चुका है। जनवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार स्टेशन पर 390 वेंडरों को वैध बताया गया था, जिन्हें क्यूआर कोड युक्त परिचय-पत्र जारी किए गए थे। वहीं जून 2026 में रेलवे ने 26 अनधिकृत वेंडरों पर कार्रवाई कर ₹43,090 का जुर्माना वसूला था।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि रेलवे स्टेशन परिसर में मीडिया के नाम पर किसी व्यक्ति द्वारा वेंडरों से कथित वसूली की शिकायतों की जांच कौन करेगा? क्या संबंधित व्यक्ति के पास किसी मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थान का परिचय-पत्र है? क्या उसके खिलाफ शिकायतें हैं? और क्या वेंडरों से पैसे मांगने के आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए?
यह मामला केवल कानपुर तक सीमित न रहकर देश के दूसरे रेलवे स्टेशनों पर भी ‘मीडिया’ के नाम पर होने वाली कथित वसूली और ब्लैकमेलिंग की व्यवस्था की जांच की जरूरत की ओर इशारा करता है।
रेलवे, आरपीएफ और स्थानीय प्रशासन से मांग है कि यदि ऐसी शिकायतें प्राप्त होती हैं तो उपलब्ध वीडियो, ऑडियो, भुगतान संबंधी साक्ष्य और संबंधित व्यक्तियों की पहचान की निष्पक्ष जांच की जाए।
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